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तुम लोगों को कार्य समझना होगा; उलझकर इसके पीछे नहीं चलो!

वर्तमान में ऐसे कई लोग हैं जो एक उलझे हुए तरीके से आस्था रखते हैं। तुम लोगों की जिज्ञासा बहुत बड़ी है, अपने आशिषों को प्राप्त करने की तुम लोगों की इच्छा बहुत बड़ी है, और जीवन को आगे बढ़ाने की तुम लोगों की इच्छा बहुत छोटी है। आजकल, यीशु के विश्वासी उत्साह से भरे हुए हैं। यीशु उनका अपने स्वर्गीय घर में स्वागत करने जा रहा है—क्या वे विश्वास नहीं कर सकते? कुछ लोग अपने पूरे जीवन में विश्वासी बने रहते हैं, कुछ लोगों का विश्वास बीस से अधिक वर्षों के लिए बना रहता है, या चालीस या पचास वर्षों के लिए बना रहता है; वे बाइबल पढ़ते हुए कभी थकते नहीं हैं।

मानव जाति के प्रबंधन का उद्देश्य

यदि लोग वास्तव में मानव जीवन के सही मार्ग को और साथ ही परमेश्वर के मानव जाति के प्रबंधन के उद्देश्य को पूरी तरह से समझ सकते हैं, तो वे अपने व्यक्तिगत भविष्य और भाग्य को अपने दिल में एक खजाने के रूप में थामे नहीं रहेंगे। वे अब और अपने माता-पिता की सेवा करना नहीं चाहेंगे, जो सूअरों और कुत्तों से भी बदतर हैं। क्या मनुष्य के भविष्य और भाग्य ठीक वर्तमान समय के पतरस के तथाकथित "माता-पिता" नहीं हैं? वे मनुष्य के अपने मांस और रक्त की तरह हैं।

राज्य का युग वचन का युग है

राज्य का युग वचन का युग है
राज्य के युग में, परमेश्वर नए युग की शुरूआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने और संपूर्ण युग के लिये काम करने की ख़ातिर अपने वचन का उपयोग करता है। वचन के युग में यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। वह देहधारी हुआ ताकि विभिन्न दृष्टिकोणों से बातचीत कर सके, मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को देख सके, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, उसकी बुद्धि और चमत्कार को जान सके। उसने यह कार्य इसलिए किये ताकि वह मनुष्यों को जीतने, उन्हें पूर्ण बनाने और ख़त्म करने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल कर सके।

पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य

तुम आत्मा के सुनिश्चित विवरणों को कैसे समझते हो? पवित्र आत्मा मनुष्य में कैसे कार्य करता है? शैतान मनुष्य में कैसे कार्य करता है? दुष्ट आत्माएँ मनुष्य में कैसे कार्य करती हैं? और इस कार्य के प्रकटीकरण क्या हैं? जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, तो क्या यह पवित्र आत्मा की ओर से होता है, और क्या तुम्हें उसे मानना चाहिए या ठुकरा देना चाहिए?

परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है

परमेश्वर भिन्न-भिन्न युगों के अनुसार अपने वचन कहता है और अपना कार्य करता है, तथा भिन्न-भिन्न युगों में, वह भिन्न-भिन्न वचन कहता है। परमेश्वर नियमों से नहीं बँधता है, और एक ही कार्य को दोहराता नहीं है, और न अतीत की बातों को लेकर विषाद करता है; वह ऐसा परमेश्वर है जो सदैव नया है, कभी पुराना नहीं होता है, और वह हर दिन नये वचन बोलता है, जिसका आज पालन किया जाना चाहिए यही मनुष्य की जिम्मेदारी और कर्तव्य है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि अभ्यास परमेश्वर की वर्तमान रोशनी और वास्तविक वचनों के आस-पास केन्द्रित हो।

परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

मनुष्य के बीच परमेश्वर का कार्य मनुष्य से अवियोज्य है, क्योंकि मनुष्य इस कार्य का लक्ष्य है, और परमेश्वर के द्वारा रचा गया एकमात्र ऐसा प्राणी है जो परमेश्वर की गवाही दे सकता है। मनुष्य का जीवन और मनुष्य के समस्त क्रियाकलाप परमेश्वर से अवियोज्य हैं, और उन सब को परमेश्वर के हाथों के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, और यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर से स्वाधीन होकर अस्तित्व में नहीं रह सकता है। कोई भी इसे नकार नहीं सकता है, क्योंकि यह एक तथ्य है। वह सब कुछ जो परमेश्वर करता है मनुष्यजाति के लाभ के लिए है, और शैतान के षडयन्त्रों की ओर निर्देशित है।

बाइबल के विषय में (4)

बहुत से लोग यह विश्वास करते हैं कि बाइबल को समझना और उसकी व्याख्या करने में समर्थ होना सच्चे मार्ग की खोज करने के समान है—परन्तु वास्तव में, क्या ये चीज़ें इतनी सरल हैं? बाइबल की सच्चाई को कोई नहीं जानता हैः कि यह परमेश्वर के कार्य के ऐतिहासिक अभिलेख, और परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरणों की गवाही से बढ़कर और कुछ नहीं है, और तुम्हें परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों की कोई समझ नहीं देता है। जिस किसी ने भी बाइबल को पढ़ा है वह जानता है कि यह व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के दो चरणों को प्रलेखित करता है।

बाइबल के विषय में (3)

बाइबल की हर चीज़ परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से बोले गए वचनों का लिखित दस्तावेज़ नहीं है। बाइबल सामान्यतः परमेश्वर के कार्य की पिछली दो अवस्थाओं का आलेख करती है, उसमें से एक भाग है जो पैग़म्बरों की भविष्यवाणियों का लिखित दस्तावेज़ है, और एक भाग वह अनुभव और ज्ञान है जिन्हें युगों के दौरान उन लोगों के द्वारा लिखा गया था जिन्हें परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किया गया था। मानवीय अनुभवों को मानवीय अनुमानों और ज्ञान के साथ दूषित किया गया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। बाइबल की बहुत सी पुस्तकों में मानवीय धारणाएँ, मानवीय पक्षपात, और मनुष्यों के बेतुके अनुवाद हैं। हाँ वास्तव में, बहुत सारे वचन पवित्र आत्मा के प्रकाशन और अलौकिक ज्ञान का परिणाम हैं और वे सही अनुवाद हैं - फिर भी यह अभी नहीं कहा जा सकता है कि वे पूरी तरह सत्य की सही अभिव्यक्ति हैं।

बाइबल के विषय में (2)

बाइबल को पुराना नियम और नया नियम भी कहते हैं। क्या तुम लोग जानते हो कि "नियम" किसे संदर्भित करता है? "पुराने नियम" में "नियम" इस्राएल के लोगों के साथ बांधी गई परमेश्वर की वाचा से आता है जब उसने मिस्रियों को मार डाला था और इस्राएलियों को फिरौन से बचाया था। हाँ वास्तव में, मेमने का लहू इस वाचा का प्रमाण था जिसे दरवाज़ों की चैखट के ऊपर पोता गया था, जिसके द्वारा परमेश्वर ने मनुष्य के साथ एक वाचा बांधी थी, एक ऐसी वाचा जिसमें कहा गया था कि वे सभी लोग जिनके दरवाज़ों के ऊपर और अगल बगल मेमने का लहू लगा हुआ हो वे इस्राएली हैं, वे परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, और उन सभी को परमेश्वर के द्वारा बख्श दिया जाएगा (क्योंकि यहोवा उस समय मिस्र के पहिलौठे पुत्रों और भेड़ों और पशुओं के पहिलौठों को मारने ही वाला था)। इस वाचा में दो स्तर के अर्थ हैं।

बाइबल के विषय में (1)

परमेश्वर में विश्वास करते हुए बाइबल के समीप कैसे जाना चाहिए? यह एक सैद्धांतिक प्रश्न है। हम इस प्रश्न पर संवाद क्यों कर रहे हैं? क्योंकि तुम भविष्य में सुसमाचार को फैलाओगे और राज्य के युग के कार्य का विस्तार करोगे, और इसलिए आज मात्र परमेश्वर के कार्य के बारे में बात करने के योग्य होना ही काफी नहीं है। उसके कार्य का विस्तार करने के लिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि तुम लोगों की पुरानी धार्मिक अवधारणाओं और विश्वास के पुराने माध्यमों का समाधान करने के योग्य बनो, और उन्हें पूरी तरह आश्वस्त करके ही छोड़ो—और उस स्थिति तक आने में बाइबल शामिल है। बहुत सालों से, लोगों के विश्वास का परम्परागत माध्यम (दुनिया के तीन मुख्य धर्मों में से एक, मसीहियत के विषय में) बाइबल पढ़ना ही रहा है; बाइबल से दूर जाना प्रभु में विश्वास नहीं है, बाइबल से दूर जाना एक पाषंड और विधर्म है, और यहाँ तक कि जब लोग अन्य पुस्तकों को पढ़ते हैं, तो इन पुस्तकों की बुनियाद, बाइबल की व्याख्या ही होनी चाहिए।

परमेश्वर की इच्छा के प्रति सावधान रहना और पूर्णता को प्राप्त करना

जितना अधिक तू परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत रहेगा, तेरा बोझ उतना अधिक हो जाएगा। तेरा बोझ जितना ज्यादा होगा, उतना तेरा अनुभव ज्यादा होगा। जब तू परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत होता है, परमेश्वर इस बोझ को तुझे देगा, और तू परमेश्वर द्वारा उन बातों पर प्रबुद्ध किया जाएगा, जो उसने तुझे सौंपा है। परमेश्वर द्वारा यह बोझ तुझे दिए जाने के बाद, तुझे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय इस पहलु की सच्चाईयों पर ध्यान देना होगा। यदि तेरे ऊपर भाइयों और बहनों की जीवन दशा से जुड़ा बोझ है तो यह बोझ परमेश्वर ने तुझे सौंपा है, तब तेरी प्रतिदिन की प्रार्थना में भी यह बोझ हमेशा रहेगा। परमेश्वर जो करता ह वह तुझे सौंपा गया है, जिसे परमेश्वर करना चाहता है, उसे आगे ले जाने के लिए तू इच्छुक होगा, और यही अर्थ है परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ समझना। इस बिंदु पर, तेरा परमेश्वर के वचन को खाना और पीना इन बातों के पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित करेगा, और तू सोचेगा, मैं कैसे इन बातों को हल करूंगा? कैसे मैं भाइयों और बहनों को उनकी आत्मा में आनंद प्राप्त करने के लिए, स्वतंत्र होने दूंगा।

परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?

परमेश्वर में विश्वास करने में तुम्हें कम से कम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने के विषय का समाधान करना चाहिए। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध के बिना परमेश्वर में विश्वास करने का महत्व खो जाता है। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध को स्थापित करना परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने के द्वारा ही किया जा सकता है। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध को स्थापित करने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करना या उसका इनकार न करना, बल्कि उसके प्रति समर्पित रहना, और इससे बढ़कर इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादों को रखना, स्वयं के बारे में न सोचते हुए हमेशा परमेश्वर के परिवार की बातों को सबसे महत्वपूर्ण विषय के रूप में सोचना, फिर चाहे तुम कुछ भी क्यों न कर रहे हो, परमेश्वर के अवलोकन को स्वीकार करना और परमेश्वर के प्रबंधनों के प्रति समर्पण करना।

तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है

तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में क्या पता होना चाहिए? आत्मा, व्यक्तित्व और वचन मिलकर ही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर को बनाते हैं; और यही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक अर्थ है। यदि तू सिर्फ़ व्यक्तित्व के बारे में जानता है, यदि तू उसकी आदतों, और उसकी शख्सियत के बारे में जानता है, लेकिन तू आत्मा के कार्य या देह में आत्मा के कार्य के बारे में कुछ नहीं जानता है, और व्यावहारिक परमेश्वर में परमेश्वर के आत्मा के कार्य के बारे में कुछ भी जाने बिना, सिर्फ़ आत्मा और वचन पर ध्यान देता है, और केवल आत्मा के सामने प्रार्थना करता है, तो यह साबित करता है कि तुझे व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है।

तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई

6000 वर्षों के दौरान कार्य की समग्रता समय के साथ धीरे-धीरे बदल गई है। इस कार्य में बदलाव समस्त संसार की परिस्थितियों के अनुसार हुए हैं। परमेश्वर का प्रबंधन का कार्य केवल मानवजाति के पूर्णरूपेण विकास की प्रवृत्ति के अनुसार धीरे-धीरे रूपान्तरित हुआ है; सृष्टि के आरंभ में इसकी पहले से योजना नहीं बनाई गई थी। संसार का सृजन करने से पहले, या इसके सृजन के ठीक बाद, यहोवा ने अभी तक कार्य के प्रथम चरण, व्यवस्था की; कार्य के दूसरे चरण—अनुग्रह की; और कार्य के तीसरे चरण—जीतने की योजना नहीं बनायी थी, जिनमें वह सबसे पहले लोगों के एक समूह—मोआब के कुछ वंशजों के बीच कार्य करता, और इसके माध्यम से वह समस्त ब्रह्माण्ड को जीतता।

केवल शोधन का अनुभव करने के द्वारा ही मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रेम कर सकता है

शोधन के दौरान मनुष्य को परमेश्वर से प्रेम कैसे करना चाहिए? शोधन का अनुभव करने के बाद, और शोधन के दौरान लोग सच्चाई के साथ परमेश्वर की प्रशंसा कर सकते हैं और यह देख सकते हैं कि उनमें कितनी घटी है। जितना बड़ा तुम्हारा शोधन होता है, उतना ही अधिक तुम शरीर को त्याग सकते हो; जितना बड़ा उनका शोधन होता है, परमेश्वर के प्रति लोगों का प्रेम उतना ही अधिक होता है। तुम लोगों को यह बात समझनी चाहिए।

केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है

आज, जब तुम लोग परमेश्वर को जानने और प्रेम करने की कोशिश करते हो, तो एक ओर तुम लोगों को अवश्य कठिनाई और शुद्धिकरण को झेलना चाहिए और दूसरी ओर, तुम लोगों को एक क़ीमत अवश्य चुकानी चाहिए। परमेश्वर को प्रेम करने के सबक से ज्यादा गहरा कोई सबक नहीं है, और ऐसा कहा जा सकता है कि जीवन भर के विश्वास से लोग जिस सबक को सीखते हैं वह है कि परमेश्वर को किस प्रकार से प्रेम करें। कहने का अर्थ है यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो तो तुम्हें उससे प्रेम अवश्य करना चाहिए।

परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और परमेश्वर के चरण-चिन्हों का अनुसरण करो

अब, तुम लोगों को परमेश्वर की प्रजा बनने की कोशिश करनी है, और तुम सब पूरी प्रविष्टि को सही राह पर शुरू करोगे। परमेश्वर के लोग होने का अर्थ है राज्य के युग में प्रवेश करना। आज, तुम सब आधिकारिक तौर पर राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करना शुरू कर रहे हो, और तुम लोगों के भावी जीवन अब पहले की तरह सुस्त और लापरवाह नहीं रहेंगे; ऐसे जीवन परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों को प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं। अगर तुम्हें कोई अत्यावश्यकता महसूस नहीं होती है, तो यह दिखाता है कि तुम खुद को सुधारने की कोई इच्छा नहीं रखते हो, कि तुम्हारा अनुसरण उलझा हुआ और भ्रमित है, और तुम परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ हो।

कलिसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचन "परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार" (भाग चार)


कलिसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचन "परमेश्वरसत्य द्वारा आवासित देह का सार" (भाग चार)



सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "देहधारण का अर्थ यह है कि परमेश्वर देह में प्रकट होता है, और वह अपनी सृष्टि के मनुष्यों के मध्य देह की छवि में कार्य करने आता है। इसलिए, परमेश्वर को देहधारी होने के लिए, उसे सबसे पहले देह, सामान्य मानवता वाली देह अवश्य होना चाहिए; यह, कम से कम, सत्य अवश्य होना चाहिए। वास्तव में, परमेश्वर का देहधारण का निहितार्थ यह है कि परमेश्वर देह में रह कर कार्य करता है, परमेश्वर अपने वास्तविक सार में देहधारी बन जाता है, एक मनुष्य बन जाता है। ......चूँकि उसे, एक देह के रूप में, बढ़ने और परिपक्व होने की आवश्यकता है, इसलिए उसके जीवन का पहला चरण सामान्य मानवता का जीवन है, जबकि दूसरे चरण में, क्योंकि उसकी मानवता उसके कार्य का दायित्व लेने और उसकी सेवकाई को करने में सक्षम है, इसलिए अपनी सेवकाई के दौरान देहधारी परमेश्वर जिस जीवन को जीता है वह मानवता और पूर्ण दिव्यता दोनों का एक जीवन है।"
अनुशंसित:सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया-Hindi Christian Movie

छब्बीसवाँ कथन

छब्बीसवाँ कथन

मेरे घर में कौन रहा है? कौन मेरे लिए खड़ा हुआ है? किसने मेरे बदले दुःख उठाया है? किसने मेरे सामने अपने वचन की प्रतिज्ञा ली है? किसने वर्तमान तक मेरा अनुसरण किया है और अभी तक विरक्त नहीं हुआ है? सभी मनुष्य भावना रहित और संवेदनाशून्य क्यों हैं? मानवजाति ने मेरा परित्याग क्यों कर दिया है? मानवता मुझ से क्यों ऊब गई है? मानवीय संसार में कोई उत्साह क्यों नहीं है? जबकि सिय्योन में, मैंने उस उत्साह का स्वाद चखा है जो स्वर्ग में है, और जबकि सिय्योन में मैंने उन आशीषों का आनन्द उठाया है जो स्वर्ग में हैं। फिर, मैंने मानवजाति के बीच में जीवन बिताया है, मैंने मानवीय संसार में कड़वाहट का स्वाद चखा है, मैंने अपनी स्वयं की आँखों से सभी अलग-अलग अवस्थाओं को देखा है जो मनुष्यों के बीच में विद्यमान हैं