सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: परमेश्वर के प्रकट होने को समझने के समय पर, तुम लोगों को परमेश्वर के पदचिन्हों को कैसे ढूंढना चाहिए? इस प्रश्न की व्याख्या करना कठिन नहीं हैः जहाँ कहीं परमेश्वर का प्रकटन है, वहां तुम्हें परमेश्वर के पदचिन्ह मिलेंगे।इस तरह की व्याख्या बहुत सीधी लगती है, लेकिन करने के लिए बहुत आसान नहीं है, क्योंकि कई लोगों को नहीं पता कि परमेश्वर अपने आप को कहाँ प्रकट करता है, उससे भी कम कि कहाँ वह स्वयं प्रकट होना चाहता है या, उसे प्रकट होना चाहिए। कुछ आवेगशीलता से विश्वास करते हैं कि जहां पवित्र आत्मा का कार्य है, वहीं परमेश्वर का प्रकटन है। अन्यथा उनका यह मानना है कि जहां आध्यात्मिक मूर्तियां हैं, वहीं परमेश्वर का प्रकटन है। अन्यथा उनका यह मानना है कि जहां लोगों को अच्छी पहचान है, वहाँ परमेश्वर का प्रकट होना है।
अभी के लिए, हम विचार विमर्श नहीं करते हैं कि ये मान्यताएं सही हैं या गलत हैं। इस तरह के प्रश्न की व्याख्या करने के लिए, हमारा पहले एक उद्देश्य के विषय में स्पष्ट होना अनिवार्य हैः हम परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज रहे हैं। हम आध्यात्मिक व्यक्तियों को नहीं खोज रहे हैं, प्रसिद्ध मूर्तियों का अनुसरण तो बिल्कुल नहीं कर रहे हैं; हम परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण कर रहे हैं। वैसे, चूँकि हम परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज रहे हैं, हमें अवश्य ही परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के कथन की खोज करनी चाहिए; क्योंकि जहां परमेश्वर के नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है, और जहां परमेश्वर के पदचिन्ह हैं, वहाँ परमेश्वर के कार्य हैं। जहां परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर का प्रकट होना है, और जहां परमेश्वर का प्रकट होना है, वहाँ मार्ग, सत्य और जीवन का अस्तित्व है। परमेश्वर के पदचिन्हों को ढूँढते हुए, तुम लोगों ने उन शब्दों की अवहेलना कर दी कि "परमेश्वर ही मार्ग, सत्य और जीवन है।" इसलिए कई लोग जब सत्य प्राप्त करते हैं, वे विश्वास नहीं करते कि वे परमेश्वर के पदचिन्हों को पा चुके हैं और बहुत कम परमेश्वर के प्रकट होने को स्वीकार करते हैं। कितनी गंभीर त्रुटि है यह! परमेश्वर के प्रकट होने का मनुष्य की धारणाओं के साथ समझौता नहीं किया जा सकता है, परमेश्वर का मनुष्य के आदेश पर दिखाई देना उस से भी कम संभव है। जब परमेश्वर अपना कार्य करता है तो वह अपने स्वयं के चुनाव करता है और अपनी स्वयं की योजनाएं बनाता है; इसके अलावा, उसके पास अपने ही उद्देश्य हैं, और अपने ही तरीके हैं। जो कार्य वह करता है उसे उस पर मनुष्य के साथ चर्चा करने की या मनुष्य की सलाह लेने की आवश्यकता नहीं है, और ना ही उसे अपने कार्य की हर एक व्यक्ति को सूचना देने की आवश्यकता है। यह परमेश्वर का स्वभाव है और, इससे बढ़कर, हर किसी को यह पहचानना चाहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के प्रकट होने को देखने की चाहत रखते हो, यदि तुम लोग परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण करने के इच्छुक हो, तो फिर तुम लोगों को पहले अपनी धारणाओं से ऊँचा उठना आवश्यक है। तुम लोगों को यह माँग नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर यह कार्य करे या वह करे, उससे भी कम तुझे उसे अपनी स्वयं की सीमा में रखना चाहिए और उसे अपनी स्वयं की धारणाओं में सीमित करना चाहिए। इसके बजाय, तुम लोगों को उससे यह पूछना चाहिए कि कैसे तुम लोग परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज सकते हो, तुम लोगों को परमेश्वर के प्रकट होने को कैसे स्वीकार करना चाहिए, और कैसे तुम लोगो को परमेश्वर के नए कार्य के लिए समर्पण करना चाहिए; मनुष्य को यही कार्य करना चाहिए। चूँकिमनुष्य सत्य नहीं है, और न ही सत्य के अधीन है, इसलिए मनुष्य को खोज करनी, स्वीकार करना, और पालन करना चाहिए।
अभी के लिए, हम विचार विमर्श नहीं करते हैं कि ये मान्यताएं सही हैं या गलत हैं। इस तरह के प्रश्न की व्याख्या करने के लिए, हमारा पहले एक उद्देश्य के विषय में स्पष्ट होना अनिवार्य हैः हम परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज रहे हैं। हम आध्यात्मिक व्यक्तियों को नहीं खोज रहे हैं, प्रसिद्ध मूर्तियों का अनुसरण तो बिल्कुल नहीं कर रहे हैं; हम परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण कर रहे हैं। वैसे, चूँकि हम परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज रहे हैं, हमें अवश्य ही परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के कथन की खोज करनी चाहिए; क्योंकि जहां परमेश्वर के नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है, और जहां परमेश्वर के पदचिन्ह हैं, वहाँ परमेश्वर के कार्य हैं। जहां परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर का प्रकट होना है, और जहां परमेश्वर का प्रकट होना है, वहाँ मार्ग, सत्य और जीवन का अस्तित्व है। परमेश्वर के पदचिन्हों को ढूँढते हुए, तुम लोगों ने उन शब्दों की अवहेलना कर दी कि "परमेश्वर ही मार्ग, सत्य और जीवन है।" इसलिए कई लोग जब सत्य प्राप्त करते हैं, वे विश्वास नहीं करते कि वे परमेश्वर के पदचिन्हों को पा चुके हैं और बहुत कम परमेश्वर के प्रकट होने को स्वीकार करते हैं। कितनी गंभीर त्रुटि है यह! परमेश्वर के प्रकट होने का मनुष्य की धारणाओं के साथ समझौता नहीं किया जा सकता है, परमेश्वर का मनुष्य के आदेश पर दिखाई देना उस से भी कम संभव है। जब परमेश्वर अपना कार्य करता है तो वह अपने स्वयं के चुनाव करता है और अपनी स्वयं की योजनाएं बनाता है; इसके अलावा, उसके पास अपने ही उद्देश्य हैं, और अपने ही तरीके हैं। जो कार्य वह करता है उसे उस पर मनुष्य के साथ चर्चा करने की या मनुष्य की सलाह लेने की आवश्यकता नहीं है, और ना ही उसे अपने कार्य की हर एक व्यक्ति को सूचना देने की आवश्यकता है। यह परमेश्वर का स्वभाव है और, इससे बढ़कर, हर किसी को यह पहचानना चाहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के प्रकट होने को देखने की चाहत रखते हो, यदि तुम लोग परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण करने के इच्छुक हो, तो फिर तुम लोगों को पहले अपनी धारणाओं से ऊँचा उठना आवश्यक है। तुम लोगों को यह माँग नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर यह कार्य करे या वह करे, उससे भी कम तुझे उसे अपनी स्वयं की सीमा में रखना चाहिए और उसे अपनी स्वयं की धारणाओं में सीमित करना चाहिए। इसके बजाय, तुम लोगों को उससे यह पूछना चाहिए कि कैसे तुम लोग परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज सकते हो, तुम लोगों को परमेश्वर के प्रकट होने को कैसे स्वीकार करना चाहिए, और कैसे तुम लोगो को परमेश्वर के नए कार्य के लिए समर्पण करना चाहिए; मनुष्य को यही कार्य करना चाहिए। चूँकिमनुष्य सत्य नहीं है, और न ही सत्य के अधीन है, इसलिए मनुष्य को खोज करनी, स्वीकार करना, और पालन करना चाहिए।
स्रोत :परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें